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गुस्से से भी भरी है नई पीढ़ी

गुस्से से भी भरी है नई पीढ़ी
मल्टी नेशनल कंपनी में अच्छी पोस्ट पर कार्यरत नमन के पास जीवन की लगभग हर खुशी है। रहने के लिए एक अच्छा घर, पढ़ी-लिखी, समझदार बीवी व पांच साल का प्यारा-सा बेटा। आर्थिक रूप से काफी मजबूत नमन ऑफिस में भी अच्छा परफोर्मेंस देता है। लेकिन उसकी एक आदत से घर और ऑफिस में उसके सहयोगी सभी परेशान रहते हैं। नमन स्वंय ही अपनी इस आदत से काफी परेशान है। यह आदत है छोटी-छोटी बातों पर अकसर नमन को गुस्सा आ जाता है। उसे खुद भी नहीं मालूम कि कब और किस बात पर उसे गुस्सा आ जाए और वह दूसरों पर चीखने-चिल्लाने लगे। सारी सुख-सुविधाएं होने के बावजूद नमन के गुस्से की इस आदत के कारण वह अकसर परेशान रहता है।
यह गुस्सा ही है जिसने नमन की छवि घर और ऑफिस दोनों ही जगहों पर बिगाड़ कर रख दी है। कभी-कभी तो नमन अपनी इस आदत से इतना परेशान हो जाता है कि उसे सब कुछ बर्बाद कर देने की इच्छा होने लगती है। नमन की ही तरह देश के युवाओं का एक बड़ा वर्ग गुस्से की इस बीमारी से ग्रस्त होता जा रहा है। इस समस्या ने न सिर्फ हमारी युवा पीढ़ी की कार्यक्षमता को प्रभावित किया है बल्कि देशभर में आपराधिक गतिविधियों को अंजाम देने वाले ज्यादातर मामलों के पीछे यह गुस्सा ही होता है। गुस्से ने आज की युवा पीढ़ी को आउट ऑफ कंट्रोल कर दिया है। हमारी नई पीढ़ी गुस्से की इस कदर आदी हो चुकी है कि अब गुस्सा उन पर पूरी तरह हावी हो चुका है जिसे नियंत्रित करना उनके वश की बात नहीं रह गयी है। यूं तो गुस्सा आना एक स्वाभाविक प्रक्रिया है।
लेकिन जरूरत से ज्यादा गुस्सा आपके बीमार होने का लक्षण है। बेवजह छोटी-छोटी बातों पर गुस्सा करने का अर्थ है आप इन्सोमेनिया या डिप्रेशन के शिकार हैं। यह दोनों प्रकार की बीमारियां सीधे हमारे दिमाग पर असर डालती हैं। आज की युवा पीढ़ी के गुस्से का स्तर पागलपन की हद तक पहुंच चुका है। गुस्से की बीमारी से ग्रस्त होने वालों को यह पता ही नहीं चलता कि वे किस हद तक इसके शिकार होते जा रहे हैं। अगर आप सड़क पर मौजूद टै्रफिक जाम को देखकर और गलियों में होने वाले बेकार के शोर को सुनकर अचानक बुरी तरह चीखने-चिल्लाने लगते हैं और तब तक चिल्लाते रहते हैं जब तक आपके गले में दर्द न होने लगे, तो समझिये आप गुस्से की घातक बीमारी से ग्रस्त हैं। गुस्से की समस्या से परेशान रहने वाले लोगों को कभी-कभी तो आपस में जोर-जोर से हंस-बोल रहे दो लोगों पर या उछल-कूद करते हुए बच्चों पर ही काफी तेज गुस्सा आ जाता है और वे बिना किसी कारण के उन पर चीखने-चिल्लाने लगते हैं। अब इसे पागलपन नहीं तो और क्या कहा जाएगा? गुस्से की बीमारी से ग्रस्त लोग इस पर नियंत्रण नहीं रख पाते और समय-समय पर गुस्सा उन्हें आपे से बाहर कर देता है जो न चाहते हुए भी उन्हें चुप रहने नहीं देता है। वे अपने गुस्से के सामने आने वाले किसी भी व्यक्ति को इसका शिकार बना देते हैं। कभी-कभी तो गुस्सा हमें इस कदर परेशान करता है कि हम पहली बार मिले किसी व्यक्ति को भी बिना कुछ सोचे-समझे कुछ भी बोल देते हैं।
भले ही इससे हमारा कितना भी नुकसान क्यों न हो जाए। आज की न्यू जनरेशन पर गुस्सा इस कदर हावी हो चुका है कि वह अपने फायदे और नुकसान को दरकिनार कर गुस्से को जाहिर करने में जरा सी भी देरी नहीं करना चाहती। इस देरी न करने के कारण ही समाज में आपराधिक प्रवृत्तियों का जाल दिनों-दिन फैलता ही जा रहा है। गुस्सा हमारे दिमाग पर इस कदर प्रभाव डालता है कि हमारे सोचने-समझने की सारी शक्ति कुछ देर के लिए खत्म-सी हो जाती है। फिर हम वही करते हैं जो हमारा गुस्सा हमसे करवाना चाहता है। लगातार गुस्से में बने रहने वाले लोगों के पारिवारिक व सामाजिक रिश्ते भी बिगड़ जाते हैं। ऑफिस तो दूर घर पर उनके अपने भी उनसे कतराने लगते हैं। गुस्सा किसी की भी पब्लिक इमेज खराब कर सकता है। गुस्से का प्रभाव सिर्फ संबंधों तक ही सीमित नहीं है। यह आपकी कार्यक्षमता पर भी बेहद नकारात्मक प्रभाव डालता है। गुस्से की समस्या के शिकार लोगों की स्मरणशक्ति व एकाग्रता क्षमता भी प्रभावित होती है।

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