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Beti Bachao: जींद के जुलाना में किसान परिवार ने अनोखे अंदाज में मनाया बेटी का जन्म, कुआं पूजन और डीजे पर जमकर नाचे ग्रामीण

Jind Julana News: जींद जिले के जुलाना क्षेत्र के शादीपुर गांव में एक किसान परिवार ने घर में बेटी के जन्म पर रूढ़िवादी परंपराओं को तोड़ते हुए बेटों की तरह भव्य उत्सव मनाया है। परिवार ने न केवल थाली बजाकर और डीजे की धुन पर कुआं पूजन किया, बल्कि पूरे गांव में मिठाई बांटकर 'बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ' का सच्चा संदेश दिया। जानिए इस प्रेरणादायक उत्सव की पूरी कहानी।
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Beti Bachao: जींद के जुलाना में किसान परिवार ने अनोखे अंदाज में मनाया बेटी का जन्म, कुआं पूजन और डीजे पर जमकर नाचे ग्रामीण

जींद/जुलाना: हरियाणा के ग्रामीण अंचलों में बेटियों को लेकर रूढ़िवादी और पुरानी सोच में अब तेजी से एक बड़ा और सकारात्मक बदलाव देखने को मिल रहा है। लिंगानुपात (Sex Ratio) के मामले में कभी पिछड़े माने जाने वाले जींद जिले के जुलाना क्षेत्र से महिला सशक्तिकरण और समाज को नई राह दिखाने वाली एक बेहद खूबसूरत और प्रेरणादायक खबर सामने आई है। जुलाना के नजदीकी गांव शादीपुर में एक किसान परिवार ने अपने घर में बेटी (पोती) के जन्म पर रूढ़िवादी सामाजिक बेड़ियों को तोड़ते हुए एक ऐसा भव्य और ऐतिहासिक जश्न मनाया है, जिसकी चर्चा अब पूरे क्षेत्र में बड़े पैमाने पर हो रही है।

आमतौर पर ग्रामीण क्षेत्रों में बेटों के जन्म पर मनाया जाने वाला 'कुआं पूजन' (Kuwan Pujan) उत्सव इस परिवार ने अपनी लाडली बेटी के स्वागत में बेहद धूमधाम से आयोजित किया। इस पहल से परिवार ने समाज को यह कड़ा और स्पष्ट संदेश दिया है कि आज के समय में बेटियां किसी भी मामले में बेटों से कम नहीं हैं।

थाली बजाकर हुआ लाडली का स्वागत, डीजे की धुन पर झूमा पूरा गांव

शादीपुर गांव के रहने वाले प्रगतिशील किसान नरेश कुमार के घर में हाल ही में एक नन्ही और प्यारी बेटी ने जन्म लिया। परिवार में लक्ष्मी के आगमन से नरेश कुमार, उनकी धर्मपत्नी और दादा-दादी की खुशी का कोई ठिकाना नहीं रहा। उन्होंने इस खुशी को केवल चारदीवारी तक सीमित रखने के बजाय पूरे समाज के साथ साझा करने का ऐतिहासिक फैसला किया। बेटी के जन्म लेते ही सबसे पहले घर के आंगन में पारंपरिक रूप से कांसे की थाली बजाई गई, जो आमतौर पर बेटों के जन्म का सूचक मानी जाती रही है।

इसके बाद रविवार को परिवार द्वारा एक भव्य 'कुआं पूजन' समारोह का आयोजन किया गया। उत्सव के दौरान घर से लेकर गांव के सार्वजनिक कुएं तक विशेष रोशनी और फूलों की सजावट की गई थी। कुआं पूजन के लिए जब महिलाओं की टोली मंगल गीत गाती हुई निकली, तो उनके आगे-आगे डीजे (DJ) की धुन पर परिवार के पुरुष, युवा और गांव के गणमान्य नागरिक जमकर थिरके और लाडली के आगमन का जश्न मनाया।

भोज का आयोजन और पूरे गांव में बांटी गईं मिठाइयां

इस खुशियों भरे पारिवारिक उत्सव को यादगार बनाने के लिए किसान नरेश कुमार के परिवार ने किसी भी प्रकार की कसर नहीं छोड़ी। कुआं पूजन की रस्मों के विधिवत संपन्न होने के बाद, परिवार की ओर से पूरे शादीपुर गांव के निवासियों के लिए एक विशाल और सामूहिक प्रीतिभोज (भोज) का शानदार आयोजन किया गया।

इस दौरान गांव के हर घर में विशेष रूप से तैयार की गई मिठाइयां और लड्डू बांटे गए। समारोह में शामिल होने आए ग्रामीणों, सगे-संबंधियों और पंच-सरपंचों ने नन्ही बच्ची को अपना स्नेह और उज्जवल भविष्य का आशीर्वाद दिया। गांव के बुजुर्गों ने भी परिवार के इस साहसिक और प्रगतिशील कदम की खुले दिल से सराहना की। उन्होंने कहा कि ऐसे आयोजनों से समाज में बेटियों के प्रति दृष्टिकोण में बड़ा प्रशासनिक और सामाजिक सुधार आएगा।

बेटियों को बोझ समझने वाली रूढ़िवादी सोच पर करारा प्रहार

इस ऐतिहासिक जश्न के मुख्य सूत्रधार और बच्ची के पिता नरेश कुमार ने मीडिया से बातचीत करते हुए बेहद गर्व के साथ अपने विचार साझा किए। उन्होंने कहा, "आज के आधुनिक युग में बेटा और बेटी में किसी भी स्तर पर कोई फर्क या भेदभाव नहीं किया जाना चाहिए। हमारी बेटियां आज शिक्षा, खेल, अंतरिक्ष, राजनीति और सेना सहित हर क्षेत्र में देश और प्रदेश का नाम पूरे विश्व में रोशन कर रही हैं। ऐसे में उन्हें बेटों से कम आंकना सरासर गलत और नाइंसाफी है"।

नरेश कुमार ने भावुक होते हुए कहा कि वे अपनी बेटी को पढ़ा-लिखाकर एक बेहद काबिल और जिम्मेदार नागरिक बनाएंगे ताकि वह समाज की सेवा कर सके। उन्होंने आसपास के सभी ग्रामीणों और अभिभावकों से अपील की कि वे बेटियों को बोझ समझने की संकीर्ण मानसिकता का पूरी तरह त्याग करें और उनके जन्म पर भी बेटों की ही तरह खुशियां मनाएं और उन्हें आगे बढ़ने के समान अवसर प्रदान करें।

'बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ' अभियान को मिली जमीनी मजबूती

धार्मिक और सांस्कृतिक रूप से समृद्ध हरियाणा में इस प्रकार के जमीनी उदाहरण केंद्र और राज्य सरकार द्वारा चलाए जा रहे 'बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ' महा-अभियान की वास्तविक और व्यावहारिक सफलता को बयां करते हैं। सरकारी नीतियां और पुरस्कार अपनी जगह हैं, लेकिन जब तक समाज का अन्नदाता (किसान) और ग्रामीण परिवेश खुद अंदर से जागरूक होकर अपनी बेटियों को यह सम्मान नहीं देगा, तब तक वास्तविक सामाजिक परिवर्तन संभव नहीं है।

जींद के शादीपुर गांव के इस किसान परिवार ने न केवल अपनी लाडली का मान बढ़ाया है, बल्कि पूरे हरियाणा के ग्रामीण क्षेत्रों के लिए एक नई और गौरवमयी नजीर पेश की है। यह उत्सव सोशल मीडिया और स्थानीय स्तर पर अन्य परिवारों को भी अपनी बेटियों के जन्म को एक त्योहार के रूप में मनाने के लिए प्रेरित कर रहा है।

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