पराली जलाई तो सीधे FIR: पलवल के गांवों में ढोल-मुनादी से चेतावनी, जानिए किसानों के लिए प्रशासन का प्लान
पलवल। एनसीआर (NCR) से सटे हरियाणा के पलवल जिले के गांवों में इन दिनों लाउडस्पीकर और ढोल-नगाड़ों की आवाजें गूंज रही हैं। यह कोई उत्सव की तैयारी नहीं, बल्कि धान कटाई सीजन शुरू होते ही वायु प्रदूषण पर नकेल कसने के लिए जिला प्रशासन की चौपाल-दर-चौपाल दस्तक है। पलवल के उपायुक्त डॉ. जयेन्द्र सिंह छिल्लर के सीधे निर्देशों पर कृषि एवं किसान कल्याण विभाग की टीमें गांव-गांव पहुंचकर किसानों को आगाह कर रही हैं - "खेत में फसल अवशेष न जलाएं, पराली को खेत में मिलाएं या मशीनों से उसका प्रबंधन करें।"
प्रशासन ने स्पष्ट चेतावनी दी है कि फसल अवशेष जलाने के आदेशों की अनदेखी करने पर नियमानुसार एफआईआर (FIR) दर्ज की जाएगी। इसके साथ ही, कंबाइन हार्वेस्टर चालकों पर भी विशेष नजर रखी जा रही है ताकि रात-बिरात बिना सुपर एसएमएस (Super SMS) या पराली प्रबंधन तंत्र के कटाई न हो सके।
खेत से चौपाल तक मुनादी, कंबाइन ऑपरेटरों पर भी कड़ा पहरा
जैसे ही मानसून विदा होता है, दिल्ली-एनसीआर में हवा जहरीली होने का खतरा मंडराने लगता है। पलवल जिला भौगोलिक दृष्टि से दिल्ली और यूपी की सीमा से सटा हुआ है, इसलिए यहां हर साल पराली जलाने की घटनाएं गंभीर चिंता का विषय बनती हैं।
कृषि विभाग के अधिकारी इस बार केवल नोटिस भेजने तक सीमित नहीं हैं। टीमें ग्राउंड पर जाकर चौपालों में किसानों के साथ बैठकें कर रही हैं और मुनादी (सार्वजनिक घोषणा) के जरिए चेतावनी दे रही हैं। किसानों को बताया जा रहा है कि पराली का धुआं न केवल उनके अपनों के फेफड़ों को नुकसान पहुंचाता है, बल्कि जमीन के उन मित्र कीटों और पोषक तत्वों को भी भस्म कर देता है जो अगली फसल के लिए संजीवनी का काम करते हैं। इसके अलावा, कंबाइन हार्वेस्टर से शाम 6 बजे से सुबह 10 बजे के बीच कटाई पर भी प्रतिबंधात्मक नियम लागू किए गए हैं ताकि धुंध और ओस के दौरान अवैध कटाई और पराली जलाने से रोका जा सके।
इन-सीटू या एक्स-सीटू को मिलगी वित्तीय सहायता
अगर आप एनसीआर या दिल्ली-एनसीआर से सटे इलाकों में रहते हैं, तो पलवल प्रशासन की यह सख्ती आपके सीधे सांस लेने की हवा से जुड़ी है। अक्टूबर और नवंबर के महीनों में जब पराली का धुआं धुंध के साथ मिलकर स्मोग बनाता है तो अस्पतालों में सांस और आंख के मरीजों की तादाद बढ़ जाती है।
किसानों के दृष्टिकोण से देखें तो इस बार प्रशासन का रुख सख्ती और प्रोत्साहन दोनों का है। एक तरफ जहां पराली जलाने पर पुलिस केस (FIR) और जुर्माना तय है वहीं दूसरी तरफ पराली का वैज्ञानिक प्रबंधन (इन-सीटू या एक्स-सीटू) करने वाले किसानों को सरकार की ओर से वित्तीय सहायता और 1,200 रुपये प्रति एकड़ तक की प्रोत्साहन राशि दी जा रही है। यानी नियम मानने वालों को राहत और उल्लंघन करने वालों पर सीधा कानूनी शिकंजा।
