DAP-Urea Crisis: खाद की किल्लत से परेशान किसानों के लिए राहत! ये सस्ते विकल्प बढ़ा सकते हैं पैदावार, सुधरेगी मिट्टी की सेहत
हर सीजन में डीएपी और यूरिया की किल्लत किसानों के लिए परेशानी बन जाती है। विशेषज्ञों का कहना है कि नैनो उर्वरक, जैविक खाद और संतुलित पोषण अपनाकर किसान न केवल लागत घटा सकते हैं बल्कि मिट्टी की उर्वरा शक्ति भी बढ़ा सकते हैं।
- डीएपी-यूरिया पर बढ़ती निर्भरता
- नैनो उर्वरकों का बढ़ता इस्तेमाल
- जैविक खाद से मजबूत होगी मिट्टी
- फसल अवशेष भी बन सकते हैं खाद
DAP-Urea Crisis: किसान भाइयो आओ सभी एसीसीहे से जनआते है कि प्री-मानसून (Pre-Monsoon) की दस्तक के साथ ही प्रदेश के खाद बिक्री केंद्रों पर किसानों की भीड़ बढ़ने लगी है। हर साल की तरह इस बार भी डीएपी (DAP) और यूरिया (Urea) की उपलब्धता को लेकर चिंता दिखाई दे रही है। कई इलाकों में किसान सुबह से लाइन में लगकर खाद का इंतजार कर रहे हैं क्योंकि बुवाई का समय नजदीक है और शुरुआती दिनों में पोषण की कमी फसल की वृद्धि पर सीधा असर डाल सकती है।
हालांकि कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि समस्या सिर्फ खाद की उपलब्धता नहीं बल्कि खेती में एक ही प्रकार के रासायनिक उर्वरकों (Chemical Fertilizers) पर बढ़ती निर्भरता भी है। वर्षों से किसान डीएपी और यूरिया को उत्पादन बढ़ाने का सबसे आसान तरीका मानते आए हैं लेकिन अब यही आदत मिट्टी की सेहत पर भारी पड़ रही है।
मिट्टी की ताकत क्यों हो रही कमजोर?
विशेषज्ञ बताते हैं कि लगातार असंतुलित मात्रा में रासायनिक खादों के उपयोग से मिट्टी में मौजूद जैविक कार्बन (Organic Carbon) का स्तर घट रहा है। इसके साथ ही जिंक (Zinc), सल्फर (Sulphur) और बोरॉन (Boron) जैसे सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी भी तेजी से बढ़ रही है।
नतीजा यह हो रहा है कि खेत की प्राकृतिक उर्वरा शक्ति कमजोर पड़ रही है और किसानों को हर साल पहले से ज्यादा खाद डालनी पड़ रही है। इससे खेती की लागत भी बढ़ती है और उत्पादन पर भी असर पड़ता है।
जैविक खाद फिर बन रही किसानों की ताकत
कृषि क्षेत्र से जुड़े जानकारों का कहना है कि टिकाऊ खेती (Sustainable Farming) के लिए केवल रासायनिक खादों पर निर्भर रहना सही रणनीति नहीं है। खेत में समय-समय पर जैविक खादों का इस्तेमाल मिट्टी की संरचना और पोषण क्षमता को बेहतर बनाता है।
गोबर की खाद (Farmyard Manure) मिट्टी में सूक्ष्म पोषक तत्वों की उपलब्धता बढ़ाती है। वहीं वर्मी कंपोस्ट (Vermicompost) जैविक कार्बन और फॉस्फोरस का अच्छा स्रोत माना जाता है। हरी खाद (Green Manure) मिट्टी में नाइट्रोजन बढ़ाने और उसकी बनावट सुधारने में मदद करती है।
इसके अलावा पीएसबी (PSB – Phosphate Solubilizing Bacteria) और राइजोबियम (Rhizobium) जैसे जैव उर्वरक मिट्टी में मौजूद पोषक तत्वों को पौधों के लिए अधिक उपयोगी बनाते हैं।
नैनो यूरिया और नैनो DAP बदल सकते हैं तस्वीर
पिछले कुछ वर्षों में नैनो यूरिया (Nano Urea) और नैनो डीएपी (Nano DAP) को पारंपरिक उर्वरकों के प्रभावी विकल्प के रूप में देखा जा रहा है। इनका उपयोग स्प्रेयर या ड्रोन (Drone Spraying) के माध्यम से किया जा सकता है।
कृषि विभाग और विशेषज्ञों के अनुसार 500 मिलीलीटर नैनो यूरिया का प्रभाव लगभग एक बोरी पारंपरिक यूरिया के बराबर माना जाता है। इसकी खासियत यह है कि पौधे पोषक तत्वों को तेजी से अवशोषित करते हैं और खाद की बर्बादी कम होती है।
सरकार द्वारा इन उत्पादों पर सब्सिडी (Subsidy) दिए जाने से किसानों की लागत भी कम हो सकती है।
पारंपरिक खादों के ये विकल्प भी हैं उपलब्ध
कई किसान अभी भी डीएपी और यूरिया के अलावा दूसरे विकल्पों की जानकारी नहीं रखते। विशेषज्ञों के अनुसार जरूरत के अनुसार अन्य उर्वरकों का भी उपयोग किया जा सकता है।
डीएपी के विकल्प के रूप में सिंगल सुपर फॉस्फेट (SSP) और नैनो डीएपी का उपयोग किया जा सकता है। वहीं यूरिया के विकल्प के रूप में नैनो यूरिया और अमोनियम सल्फेट (Ammonium Sulphate) उपलब्ध हैं।
पोटाश (Potash) की जरूरत के लिए पोटेशियम सल्फेट (Potassium Sulphate) और पोटेशियम क्लोराइड (Potassium Chloride) का उपयोग किया जा सकता है। संतुलित पोषण के लिए एनपीके 12:32:16 (NPK Fertilizer) भी एक विकल्प माना जाता है।
पराली जलाने की बजाय खेत में सड़ाना होगा फायदेमंद
विशेषज्ञों का कहना है कि फसल अवशेष (Crop Residue) जलाने से मिट्टी के उपयोगी सूक्ष्मजीव नष्ट हो जाते हैं। यदि किसान इन्हें खेत में ही सड़ाकर जैविक पदार्थ में बदलें तो मिट्टी की गुणवत्ता बेहतर हो सकती है।
फसल चक्र (Crop Rotation) और मिश्रित खेती (Mixed Farming) अपनाने से भी पोषक तत्वों का संतुलन बना रहता है। खासकर दलहनी फसलें मिट्टी में प्राकृतिक रूप से नाइट्रोजन बढ़ाने का काम करती हैं।
खेती का भविष्य संतुलित पोषण में
कृषि विशेषज्ञ मानते हैं कि आने वाले समय में केवल ज्यादा खाद डालकर उत्पादन बढ़ाने की सोच सफल नहीं होगी। मिट्टी की जांच (Soil Testing), संतुलित पोषण प्रबंधन (Nutrient Management) और जैविक विकल्पों का समावेश ही खेती को टिकाऊ बना सकता है।
खास बात यह है कि यदि किसान डीएपी और यूरिया की किल्लत के समय वैकल्पिक उर्वरकों का सही इस्तेमाल सीख लें, तो न केवल खाद संकट का असर कम होगा बल्कि मिट्टी की सेहत और खेती की लाभप्रदता भी लंबे समय तक बनी रह सकती है।