हिसार में आयुष्मान योजना फर्जीवाड़ा: कोर्ट से नर्सिंग होम संचालक को झटका, अग्रिम जमानत याचिका खारिज
हिसार में आयुष्मान भारत योजना में फर्जी क्लेम के मामले में नर्सिंग होम संचालक की अग्रिम जमानत याचिका खारिज। कोर्ट ने कहा- मामला गंभीर। पढ़ें पूरी रिपोर्ट विराट भारत न्यूज़ पर।
हिसार (विराट भारत न्यूज़): केंद्र और राज्य सरकार की महत्वाकांक्षी 'आयुष्मान भारत योजना' में फर्जी क्लेम के जरिए करोड़ों रुपये के घपले के मामले में हिसार अदालत ने सख्त रुख अपनाया है। हिसार की एक अदालत ने फर्जी आयुष्मान क्लेम मामले में आरोपी निजी नर्सिंग होम के संचालक की अग्रिम जमानत याचिका (Anticipatory Bail) को सिरे से खारिज कर दिया है। कोर्ट के इस फैसले के बाद अब आरोपी संचालक पर गिरफ्तारी की तलवार लटक गई है।
क्या है पूरा मामला?
अमर उजाला की रिपोर्ट के अनुसार, हिसार स्थित एक निजी नर्सिंग होम पर आयुष्मान भारत योजना के तहत फर्जी मरीजों के नाम पर अस्पताल में भर्ती दिखाए जाने और फर्जी मेडिकल बिल व क्लेम तैयार करके स्वास्थ्य विभाग से राशि ऐंठने के गंभीर आरोप हैं। जांच के दौरान पाया गया था कि जिन मरीजों के नाम पर क्लेम पास कराए गए, उनमें से कई कभी अस्पताल में भर्ती ही नहीं हुए थे।
स्वास्थ्य विभाग की शिकायत और शुरुआती जांच रिपोर्ट के आधार पर हिसार पुलिस ने नर्सिंग होम संचालक के खिलाफ मामला दर्ज किया था। गिरफ्तारी के डर से आरोपी संचालक ने अदालत में अग्रिम जमानत के लिए याचिका दाखिल की थी।
कोर्ट की सख्त टिप्पणी: सरकारी खजाने से धोखा बर्दाश्त नहीं
सुनवाई के दौरान सरकारी वकील ने कोर्ट में पक्ष रखते हुए कहा कि आयुष्मान भारत योजना गरीब और आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के इलाज के लिए बनाई गई है। इसमें फर्जीवाड़ा करना न केवल धोखाधड़ी है, बल्कि गरीब जनता के हक पर डाका डालने जैसा है।
मामले की सुनवाई करते हुए जज ने पाया कि इस पूरे रैकेट की निष्पक्ष और गहराई से जांच के लिए आरोपी से हिरासत में पूछताछ (Custodial Interrogation) जरूरी है। धोखाधड़ी और फर्जी दस्तावेज तैयार करने के अपराध की गंभीरता को देखते हुए अदालत ने अग्रिम जमानत देने से इनकार कर दिया।
कानूनी विश्लेषण (Legal Insight by Dr. Anita Sharma):
"आयुष्मान योजना में फर्जीवाड़ा भारतीय न्याय संहिता (BNS) के तहत जालसाजी (Forging Documents), धोखाधड़ी (Cheating) और आपराधिक साजिश (Criminal Conspiracy) की गंभीर धाराओं में आता है। जब मामला किसी सरकारी कल्याणकारी योजना में वित्तीय अनियमितता का हो, तो सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों के अनुसार अदालतें अग्रिम जमानत देने में बेहद कड़ा रुख अपनाती हैं ताकि साक्ष्यों के साथ छेड़छाड़ न हो सके।"