दिल्ली: Digital Census Update: देशभर में जारी डिजिटल जनगणना (Digital Census) को लेकर केंद्र सरकार ने एक बड़ा और नीतिगत फैसला लिया है। केंद्रीय गृह मंत्रालय (Ministry of Home Affairs) ने 1990 के पुराने जनगणना नियमों में महत्वपूर्ण संशोधन करते हुए अब प्राइवेट स्कूलों के शिक्षकों और स्टाफ की सेवाएं भी अनिवार्य रूप से लेने की अधिसूचना (Gazette Notification) जारी कर दी है। सरकार के इस कदम से निजी शिक्षण संस्थानों और शिक्षक संगठनों के बीच हलचल तेज हो गई है।
अब तक की व्यवस्था के तहत केवल सरकारी विभागों के कर्मचारियों और परिषदीय स्कूलों (Government Council Schools) के अध्यापकों को ही इस महाअभियान में तैनात किया जाता था। हालांकि, वर्कफोर्स की कमी और डिजिटल डेटा कलेक्शन की गति तेज करने के उद्देश्य से सरकार ने नियमों के दायरे को व्यापक बना दिया है। नए गजट के मुताबिक, राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों (Union Territories) के प्रशासन को अब यह कानूनी अधिकार मिल गया है कि वे किसी भी मान्यता प्राप्त (Recognized) या गैर-मान्यता प्राप्त (Unrecognized), सहायता प्राप्त (Aided) या गैर-सहायता प्राप्त निजी शिक्षण संस्थान के स्टाफ को जनगणना कार्य में तैनात कर सकें।
गौरतलब है कि पूर्व में प्राइवेट शिक्षकों को गैर-शैक्षणिक कार्यों (Non-Academic Duties) में लगाए जाने को लेकर अदालती विवाद रहा है। उत्तर प्रदेश में इलाहाबाद हाईकोर्ट, महाराष्ट्र में बॉम्बे हाईकोर्ट और पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए शिक्षकों को राहत दी थी। तब अदालतों ने कहा था कि 1990 के मौजूदा नियमों में प्राइवेट संस्थानों के स्टाफ को अनिवार्य ड्यूटी पर लगाने का कोई स्पष्ट कानूनी प्रावधान नहीं है।
अदालती आदेशों के कारण जमीनी स्तर पर डेटा संग्रहण (Data Collection) की गति धीमी होने की आशंका को देखते हुए केंद्र सरकार ने मूल नियम में ही संशोधन करने का रास्ता चुना। संशोधन के बाद अब केवल निजी शिक्षक ही नहीं, बल्कि जरूरत पड़ने पर निजी कंपनियों और विभिन्न गैर-सरकारी संस्थानों (NGOs and Private Corporate Entities) के कर्मचारियों को भी घर-घर जाकर फील्ड डेटा जुटाने के आदेश जारी किए जा सकेंगे।








