शनिवार, 31 अक्टूबर 2026

Urea Crisis: गोदामों में खाद फुल, फिर भी कतारों में किसान! जानें क्या है असली वजह

Written by: Dharmendra Acharya

Published:

18 अगस्त 2026: देश में खाद का रिकॉर्ड स्टॉक होने के बावजूद ग्राउंड लेवल पर किसान परेशान हैं। जानें कुप्रबंधन और ब्लैक मार्केटिंग के इस बड़े संकट की पूरी हकीकत।


नई दिल्ली (कृषि डेस्क) विराट भारत। खरीफ सीजन की फसलें इस समय खेतों में लहलहा रही हैं और इस वक्त फसलों को सबसे ज्यादा जरूरत यूरिया खाद की है। लेकिन देश के कई राज्यों के ग्रामीण इलाकों से आई तस्वीरें बेहद परेशान करने वाली हैं। सुबह चार बजे से ही किसान, महिलाएं और बुजुर्ग सरकारी और निजी सहकारी केंद्रों के बाहर लंबी कतारों में खड़े हो रहे हैं लेकिन घंटों इंतजार के बाद भी बड़ी संख्या में किसानों को खाली हाथ लौटना पड़ रहा है।

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एक तरफ जहां केंद्र सरकार का दावा है कि देश में जरूरत से ज्यादा खाद का स्टॉक मौजूद है, वहीं जमीनी स्तर पर ‘खाद संकट’ (Urea Shortage) गहराता जा रहा है। आइए समझते हैं इस पूरे संकट की इनसाइड स्टोरी और वह वजहें जिसके कारण किसान परेशान हैं।

जमीनी हकीकत: सरकारी गोदाम फुल, वितरण प्रणाली फेल

विभिन्न राज्यों से मिली ग्राउंड रिपोर्ट्स के अनुसार इस संकट के पीछे यूरिया की कमी नहीं बल्कि स्थानीय स्तर पर फैला कुप्रबंधन और सख्त नियम हैं जैसे:

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सप्लाई चेन और लॉजिस्टिक्स की नाकामी: अकेले राजस्थान के बफर स्टॉक गोदामों में इस समय लगभग 3 लाख मीट्रिक टन से अधिक खाद सुरक्षित रखी है। समस्या यह है कि इस स्टॉक को समय पर तहसील और ग्राम पंचायत स्तर के केंद्रों तक नहीं पहुंचाया जा रहा है जिससे स्थानीय स्तर पर कृत्रिम किल्लत (Artificial Scarcity) पैदा हो गई है।

नो लैंड रिकॉर्ड का सख्त नियम: खाद वितरण को पारदर्शी बनाने के लिए सरकार ने पीओएस (PoS) मशीनों और ऑनलाइन रिकॉर्ड को अनिवार्य किया है। इसका सबसे बड़ा नुकसान उन बटाईदार (किराए पर खेती करने वाले) किसानों को हो रहा है जिनके नाम पर जमीन का मालिकाना हक (गिरदावरी या खसरा) नहीं है। उन्हें नो लैंड रिकॉर्ड कहकर खाद देने से सीधे मना किया जा रहा है।

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ब्लैक मार्केटिंग और टैगिंग का खेल: निजी और कुछ सहकारी डीलर यूरिया की भारी मांग का फायदा उठाकर कालाबाजारी कर रहे हैं। कई केंद्रों पर किसानों को यूरिया की बोरी देने के बदले जबरन महंगे कीटनाशक, जिंक या अन्य गैर-जरूरी सप्लीमेंट खरीदने पर मजबूर किया जा रहा है।

सरकारी पक्ष: यूरिया की कोई कमी नहीं, वैश्विक संकट के बावजूद मिल रही भारी सब्सिडी

इस चौतरफा आलोचना के बीच केंद्रीय रसायन और उर्वरक मंत्रालय और सरकार ने अपना पक्ष साफ किया है:

जरूरत से 48% अधिक स्टॉक: सरकारी आंकड़ों के मुताबिक इस खरीफ सीजन के लिए देश में 163.78 लाख मीट्रिक टन यूरिया उपलब्ध कराया गया है, जबकि देश की कुल अनुमानित मांग केवल 109.40 लाख मीट्रिक टन है। सरकार का साफ कहना है कि देश के स्तर पर खाद की कोई कमी नहीं है।

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₹3000 की बोरी मात्र ₹300 में: लाल किले से देश को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भरोसा दिलाया था कि वैश्विक बाजार में यूरिया की जो बोरी सरकार को ₹3,000 की पड़ रही है, उसे भारतीय किसानों के लिए भारी सब्सिडी देकर मात्र ₹300 में उपलब्ध कराया जा रहा है ताकि किसानों पर आर्थिक बोझ न पड़े।

17 लाख टन का नया आयात: आगामी रबी सीजन और मौजूदा मांग के सुरक्षित बैकअप के लिए भारत ने हाल ही में अंतरराष्ट्रीय बाजार से 17 लाख टन अतिरिक्त यूरिया आयात करने के सौदे को अंतिम रूप दिया है।

वैश्विक कारण: अंतरराष्ट्रीय स्तर पर क्यों बढ़ा तनाव?

घरेलू कुप्रबंधन के अलावा कुछ अंतरराष्ट्रीय कारकों ने भी इस स्थिति को संवेदनशील बनाया है:

पश्चिम एशिया का संघर्ष: साल 2026 की शुरुआत से ही मध्य पूर्व में जारी तनाव के कारण हॉर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) से होने वाली फर्टिलाइजर और कच्चे माल की शिपमेंट बुरी तरह प्रभावित हुई है।

प्राकृतिक गैस की आसमान छूती कीमतें: यूरिया उत्पादन के लिए सबसे जरूरी कच्चा माल ‘नेचुरल गैस’ है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में गैस की कीमतों में आए उछाल की वजह से भारत के कई घरेलू फर्टिलाइजर प्लांट्स को उत्पादन सुचारू रखने में भारी लागत का सामना करना पड़ रहा है।

समाधान कैसे होगा? ये है विशेषज्ञों की राय

कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक जिला प्रशासन और कृषि विभाग स्थानीय डीलरों पर सख्त निगरानी नहीं रखेंगे और बटाईदार किसानों के लिए नियमों में ढील नहीं दी जाएगी तब तक गोदामों में खाद होने के बावजूद किसानों की कतारें कम नहीं होंगी।

Dharmendra Acharya
About the Author Dharmendra Acharya

धर्मेंद्र आचार्य 'विराट भारत न्यूज़' में मुख्य कृषि एवं मौसम संपादक हैं। वे आधुनिक कृषि तकनीकों, ग्रामीण अर्थव्यवस्था (Rural Economy), मौसम विज्ञान, फसलों के वैज्ञानिक प्रबंधन और मंडियों के न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) की सटीक रिपोर्टिंग करते हैं। वे भारतीय किसानों और ग्रामीण भारत की आवाज़ को मजबूती से उठाते हैं। View all posts by Dharmendra Acharya →

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