पितृपक्ष में पड़ने वाली इंदिरा एकादशी का हिंदू धर्म में विशेष महत्व बताया गया है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन भगवान विष्णु की पूजा और व्रत का पुण्य पितरों को समर्पित किया जाता है। पद्म पुराण में इंदिरा एकादशी के व्रत से पितरों को मोक्ष मिलने की मान्यता का उल्लेख मिलता है।

इस व्रत की तैयारी एकादशी के दिन से ही नहीं, बल्कि उससे एक दिन पहले दशमी तिथि से शुरू मानी जाती है। वहीं व्रत का पारण द्वादशी तिथि पर किया जाता है। ऐसे में व्रत रखने वाले लोगों के लिए दशमी, एकादशी और द्वादशी के नियमों को ध्यान में रखना जरूरी माना जाता है।

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दशमी से शुरू होती है तैयारी

व्रत से एक दिन पहले दशमी तिथि पर सात्विक भोजन करने की परंपरा बताई गई है। इस दिन भोजन में लहसुन-प्याज और तामसिक चीजों से बचने की सलाह दी जाती है। रात में ब्रह्मचर्य का पालन करने और जमीन पर सोने का भी उल्लेख मिलता है।

एकादशी के दिन चावल, जौ, मसूर की दाल, बैंगन और तामसिक भोजन को वर्जित माना गया है। धार्मिक मान्यता के अनुसार इस दिन क्रोध, झूठ बोलने और किसी की निंदा करने से भी बचना चाहिए।

तुलसी दल को लेकर यह नियम

भगवान विष्णु की पूजा में तुलसी दल का विशेष महत्व माना जाता है। हालांकि धार्मिक परंपरा के अनुसार एकादशी के दिन तुलसी के पत्ते तोड़ना उचित नहीं माना जाता। इसलिए पूजा के लिए तुलसी दल दशमी तिथि को ही तोड़कर रखने की बात कही गई है।

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ऐसे करें भगवान विष्णु की पूजा

एकादशी की सुबह जल्दी उठकर स्नान करने के बाद स्वच्छ, संभव हो तो पीले वस्त्र पहनने की परंपरा बताई गई है। इसके बाद सूर्य देव को अर्घ्य देकर भगवान विष्णु के सामने व्रत का संकल्प लिया जाता है।

घर के मंदिर या साफ स्थान पर पीला कपड़ा बिछाकर भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की पूजा की जाती है। पूजा में पंचामृत और गंगाजल से स्नान, पीला चंदन, रोली, अक्षत, पीले फूल, धूप और घी का दीपक अर्पित करने का विधान बताया गया है। भगवान विष्णु को तुलसी दल के साथ फल या पीली मिठाई का भोग लगाया जाता है।

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इसके बाद इंदिरा एकादशी की व्रत कथा सुनने या पढ़ने और विष्णु सहस्रनाम का पाठ करने की परंपरा है। पूजा के अंत में आरती की जाती है।

पितरों के लिए तर्पण और श्राद्ध

इंदिरा एकादशी की धार्मिक मान्यता में पितरों के लिए तर्पण और श्राद्ध का भी महत्व बताया गया है। दोपहर के समय दिवंगत पितरों की आत्मा की शांति के लिए तर्पण या श्राद्ध कर्म किया जाता है।

पितरों के नाम से निकाले गए भोजन को गाय, कौए और कुत्ते को खिलाने की परंपरा का भी उल्लेख है। व्रत का पुण्य पितरों को समर्पित कर उनकी मुक्ति और शांति के लिए प्रार्थना की जाती है।

रात में जागरण, द्वादशी को पारण

एकादशी की रात भगवान विष्णु के भजन-कीर्तन, मंत्र जाप और धार्मिक पुस्तकों के पाठ के साथ जागरण करने की परंपरा बताई गई है। इस दौरान 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' मंत्र का जाप किया जा सकता है।

अगले दिन द्वादशी तिथि पर स्नान और भगवान विष्णु की पूजा के बाद अपनी सामर्थ्य के अनुसार ब्राह्मणों या जरूरतमंद लोगों को अनाज, वस्त्र, फल और दक्षिणा का दान करने की बात कही गई है। इसके बाद शुभ पारण मुहूर्त में सात्विक भोजन ग्रहण कर व्रत खोलने की परंपरा है।