नई दिल्ली: भारत और स्विट्जरलैंड के बीच विज्ञान, प्रौद्योगिकी और नवाचार के क्षेत्र में सहयोग को अब नए रिसर्च फ्रेमवर्क के जरिए आगे बढ़ाया जाएगा। केंद्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि भारत-स्विस रिसर्च फ्रेमवर्क (ISRF) दोनों देशों के बीच लंबे समय से चल रही वैज्ञानिक साझेदारी को नए और उभरते क्षेत्रों तक ले जाने के लिए एक संरचित मंच उपलब्ध कराएगा।
नई दिल्ली में आयोजित भारत-स्विस रिसर्च फ्लैगशिप इवेंट 2026 में डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि भारत और स्विट्जरलैंड के बीच विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी सहयोग की औपचारिक शुरुआत 2003 में अंतर-सरकारी समझौते के साथ हुई थी। इसके बाद 2005 में संयुक्त अनुसंधान कार्यक्रम शुरू किया गया, जिसके माध्यम से दोनों देशों के वैज्ञानिकों और युवा शोधकर्ताओं को साझा परियोजनाओं से जोड़ा गया।
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20 साल के सहयोग के बाद नए क्षेत्रों पर जोर
कार्यक्रम में भारत-स्विट्जरलैंड वैज्ञानिक सहयोग के करीब दो दशकों के सफर और उसके अगले चरण पर चर्चा हुई। अब तक सहयोग पर्वत और ग्लेशियर अनुसंधान, भू-वैज्ञानिक खतरे, सिस्टम मेडिसिन, वन हेल्थ और सामाजिक विज्ञान जैसे क्षेत्रों तक पहुंच चुका है।
डॉ. सिंह के अनुसार, भारत के विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (DST), जैव प्रौद्योगिकी विभाग (DBT), पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय, भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (ICMR) और भारतीय सामाजिक विज्ञान अनुसंधान परिषद (ICSSR) ने स्विस संस्थानों के साथ मिलकर इस सहयोग को व्यापक बनाया है।
भारत और स्विट्जरलैंड के बीच विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी पर संयुक्त समिति की अब तक सात बैठकें हो चुकी हैं। इसकी सबसे हालिया बैठक सितंबर 2025 में बर्न में हुई थी।
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ग्लेशियर से लेकर AI और सामाजिक विज्ञान तक सहयोग
भारत-स्विस साझेदारी में पर्वतीय और ग्लेशियर अनुसंधान भी प्रमुख क्षेत्र रहा है। पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय और स्विस नेशनल साइंस फाउंडेशन (SNSF) के सहयोग से ग्लेशियर विकास, बर्फ के न्यूक्लियेटिंग कणों, जल वाष्प आइसोटोप और मलबे-ग्लेशियर के बीच होने वाली प्रक्रियाओं से जुड़ी चार परियोजनाओं को समर्थन मिला है।
इसके अलावा सहयोग का विस्तार भू-वैज्ञानिक खतरों और वन हेल्थ तक हुआ है। सामाजिक विज्ञान के क्षेत्र में डिजिटल गवर्नेंस, एआई नैतिकता, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के सामाजिक प्रभाव, असमानता, न्याय, समावेशन, सामाजिक एकीकरण और आर्थिक बदलाव जैसे विषयों पर भी काम किया जा रहा है।
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कार्यक्रम में मानसिक स्वास्थ्य एवं मस्तिष्क अनुसंधान, भाषा एवं भाषायी अध्ययन और हिमालयी ग्लेशियर अनुसंधान से जुड़े मौजूदा प्रोजेक्ट भी प्रस्तुत किए गए।
नवंबर 2026 में खुलेगा नया ‘एक्सप्लोर’ कार्यक्रम
भारत-स्विस रिसर्च फ्रेमवर्क के तहत नई शोध पहलों पर भी जोर दिया गया है। इनमें ‘एक्सप्लोर’ कार्यक्रम प्रमुख है जिसे नवंबर 2026 में DST और SNSF की सह-वित्त पोषित पहल के रूप में शुरू किया जाना है।
इस कार्यक्रम की अवधि 9 से 12 महीने होगी। इसका उद्देश्य नए शोध नेटवर्क विकसित करना और बुनियादी विज्ञान में शुरुआती विचारों को बड़े अनुसंधान अवसरों में बदलने में मदद करना है। इसके तहत यात्रा, नेटवर्किंग और छोटे उपकरणों के लिए सहायता का प्रावधान होगा।
डॉ. सिंह ने विज्ञान आधारित नवप्रवर्तकों के लिए इंडो-स्विस अकादमिक-इंडस्ट्री ट्रेनिंग (AIT) कार्यक्रम को भी महत्वपूर्ण पहल बताया। इसके जरिए नवाचार, तकनीक हस्तांतरण और उद्यमिता के क्षेत्र में अकादमिक संस्थानों और उद्योग के बीच सहयोग बढ़ाने पर जोर दिया जाएगा।
शोधकर्ताओं की आवाजाही और ज्ञान के आदान-प्रदान पर फोकस
डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि नया रिसर्च फ्रेमवर्क दोनों देशों के मौजूदा शोध, तकनीक और नवाचार इकोसिस्टम का पूरक बनेगा। इसका फोकस शोधकर्ताओं की आवाजाही, ज्ञान के आदान-प्रदान, रिसर्च नेटवर्किंग और लंबे समय तक चलने वाले सहयोग को मजबूत करने पर रहेगा।
कार्यक्रम में स्विस परिसंघ के अध्यक्ष गाय परमेलिन ने भी भारत और स्विट्जरलैंड के बीच अनुसंधान सहयोग को आगे बढ़ाने की जरूरत पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि भारत का तेजी से बढ़ता रिसर्च और इनोवेशन इकोसिस्टम तथा स्विट्जरलैंड की शोध उत्कृष्टता और वित्त पोषण व्यवस्था दोनों देशों के बीच गहरे सहयोग की संभावनाएं पैदा करती हैं।
भारत और भूटान में स्विट्जरलैंड की राजदूत माया तिसाफी ने भी शोध और नवाचार को दोनों देशों के संबंधों में ठोस मूल्य पैदा करने वाला क्षेत्र बताया। उनके अनुसार, दोनों देशों के वैज्ञानिकों को अधिक संख्या में जोड़ने और शोध को वास्तविक दुनिया के प्रभाव वाले समाधान में बदलने की संभावनाएं बढ़ी हैं।
कार्यक्रम के दौरान DST और SNSF के बीच आशय पत्र तथा DST और ज्यूरिख यूनिवर्सिटी ऑफ एप्लाइड साइंसेज (ZHAW) के बीच कार्यान्वयन व्यवस्था का भी स्वागत किया गया। नए फ्रेमवर्क के जरिए भारत और स्विट्जरलैंड अब मौजूदा सहयोग को अधिक व्यवस्थित तरीके से आगे बढ़ाने और नए अनुसंधान क्षेत्रों में साझेदारी विकसित करने की दिशा में काम करेंगे।







