चंडीगढ़। हरियाणा में बिजली निजीकरण को लेकर छिड़ा विवाद फिलहाल शांत हो गया है। मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी और ऊर्जा मंत्री अनिल विज के साथ चली लंबी बातचीत के बाद बिजली कर्मचारियों और इंजीनियरों की जॉइंट एक्शन कमेटी ने अपनी राज्यव्यापी हड़ताल वापस ले ली है। सरकार ने साफ भरोसा दिया है कि गुरुग्राम और नूंह में निजी कंपनी को बिजली बांटने की मंजूरी देने वाले फैसले को रद्द करवाया जाएगा। समझौते के तुरंत बाद कर्मचारियों ने मोर्चे पर लौटते हुए बाधित बिजली सप्लाई को तुरंत बहाल करने का काम शुरू कर दिया है।
किसी भी कीमत पर निजीकरण मंजूर नहीं - सीएम सैनी
हड़ताल खत्म होने के बाद यूनियन नेताओं के साथ संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस में मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी ने सरकार का रुख बिल्कुल साफ कर दिया। सीएम ने कहा कि राज्य में बिजली वितरण का किसी भी स्तर पर निजीकरण नहीं होने दिया जाएगा।
मुख्यमंत्री ने बताया कि हरियाणा विद्युत विनियामक आयोग (HERC) भले ही एक स्वतंत्र संस्था है, लेकिन सरकार ने अपने विशेषाधिकार का इस्तेमाल किया है। बिजली कानून की धारा 108 के तहत आयोग को साफ निर्देश भेजे जा रहे हैं कि वह अपने विवादित आदेश की समीक्षा करे और निजी कंपनी को दी गई मंजूरी को फौरन निरस्त करे।
हमने कोई टेंडर नहीं निकाला था - अनिल विज
ऊर्जा मंत्री अनिल विज ने स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा कि सरकार ने न तो निजीकरण के लिए कोई आवेदन मांगे थे और न ही वह आयोग के इस फैसले के पक्ष में थी। विज ने बताया कि केंद्रीय कानून के तहत कोई भी निजी कंपनी सीधे रेगुलेटर के पास अर्जी लगा सकती है, लेकिन सरकार ने पहले दिन से ही इसका पुरजोर विरोध किया था।
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विज ने जानकारी दी कि सीएम और उन्होंने मिलकर विभाग को आवश्यक कानूनी कार्रवाई शुरू करने के लिखित निर्देश जारी कर दिए हैं। इसके साथ ही दोनों पक्षों के बीच तय हुआ है कि 3 नवंबर को दोपहर 3 बजे दोबारा बैठक होगी, जिसमें अब तक की कानूनी प्रगति का पूरा ब्योरा कर्मचारियों के सामने रखा जाएगा।
क्या था पूरा विवाद और क्यों सड़क पर उतरे थे कर्मचारी?
यह सारा विवाद 19 अक्टूबर को हरियाणा विद्युत विनियामक आयोग के उस फैसले से शुरू हुआ था, जिसमें 'इलेवन पावर प्राइवेट लिमिटेड' नामक निजी कंपनी को 25 साल के लिए समानांतर बिजली वितरण का लाइसेंस थमा दिया गया था।
इस योजना के तहत गुरुग्राम शहर, मानेसर, सोहना और नूंह के लगभग 8.3 लाख घरेलू, औद्योगिक और कृषि उपभोक्ताओं को सरकारी कंपनी के अलावा एक निजी विकल्प देने की तैयारी थी। इसे 5 साल में अलग-अलग चरणों में लागू किया जाना था, जिसकी शुरुआत नूंह से होनी थी। बिजली कर्मचारियों और इंजीनियरों का आरोप था कि यह सरकारी ढांचे को खत्म कर बैकडोर से निजीकरण थोपने की शुरुआत है, जिसके विरोध में उन्होंने पूरे राज्य में हड़ताल का बिगुल फूंक दिया था।





